संत कबीरदास

संत कबीरदास जी के सर्वश्रेष्ठ दोहे | Kabir Ke Dohe Part-2 In Hindi

इस सर्वश्रेष्ठ दोहे में कबीरदास ने साधू की महिमा का पूरा वर्णन किया है | संत कबीरदास जी के सर्वश्रेष्ठ दोहे | Kabir Ke Dohe Part-2 In Hindi

 

Kabir Ke Dohe Part-2 In Hindi

संत कबीरदास जी के सर्वश्रेष्ठ दोहे | Kabir Ke Dohe Part-2 In Hindi

|| 1 || 

कबीर सोई दिन भला, जा दिन साधु मिलाय |
अंक भरे भरि भेरिये, पाप शरीर जाय ||

 

अर्थ : वो दिन बहुत अच्छा है जिस दिन सन्त मिले | सन्तो से दिल खोलकर मिलो , मन के दोष दूर होंगे |

 

|| 2 ||

दरशन कीजै साधु का, दिन में कइ कइ बार |
आसोजा का भेह ज्यों, बहुत करे उपकार ||

 

अर्थ : सन्तो के दरशन दिन में बार – बार करो | यहे आश्विन महीने की वृष्टि के समान बहुत उपकारी है |

 

|| 3 ||

दोय बखत नहिं करि सके, दिन में करू इकबार |
कबीर साधु दरश ते, उतरैं भव जल पार ||

 

अर्थ : सन्तो के दरशन दिन में दो बार ना कर सके तो एक बार ही कर ले | सन्तो के दरशन से जीव संसार – सागर से पार उतर जाता है |

 

|| 4 ||

दूजे दिन नहीं करि सके, तीजे दिन करू जाय |
कबीर साधु दरश ते, मोक्ष मुक्ति फन पाय ||

 

अर्थ : सन्त दर्शन दूसरे दिन ना कर सके तो तीसरे दिन करे | सन्तो के दर्शन से जीव मोक्ष व मुक्तिरुपी महान फल पता है |

 

|| 5 ||

बार – बार नहिं करि सकै, पाख – पाख करि लेय |
कहैं कबीर सों भक्त जन, जन्म सुफल करि लेय ||

 

अर्थ : यदि सन्तो के दर्शन साप्ताहिक न कर सके, तो पन्द्रह दिन में कर लिया करे | कबीर जी कहते है ऐसे भक्त भी अपना जन्म सफल बना सकते हैं |

 

|| 6 ||

मास – मास नहिं करि सकै, छठे मास अलबत |
थामें ढ़ील न कीजिये, कहैं कबीर अविगत ||

 

अर्थ : यदि सन्तो के दर्शन महीने – महीने न कर सके, तो छठे महीने में अवश्य करे | अविनाशी वोधदाता गुरु कबीर कहते हैं कि इसमें शिथिलता मत करो |

 

|| 7 ||

बरस – बरस नहिं करि सकैं, ताको लगे दोष |
कहैं कबीर वा जीव सों, कबहु न पावै मोष ||

 

अर्थ : यदि सन्तो के दर्शन बरस – बरस में भी न कर सके, तो उस भक्त को दोष लगता है | सन्त कबीर जी कहते हैं, ऐसा जीव इस तरह के आचरण से कभी मोक्ष नहीं पा सकता |

 

|| 8 ||

इन अटकाया न रुके, साधु दरश को जाय |

कहैं कबीर सोई संतजन, मोक्ष मुक्ति फल पाय ||

 

अर्थ : किसी के रोडे डालने से न रुक कर, सन्त – दर्शन के लिए अवश्य जाना चहिये | सन्त कबीर जी कहते हैं, ऐसे ही सन्त भक्तजन मोक्ष फल को पा सकते हैं |

 

|| 9 ||

खाली साधु न बिदा करूँ, सुन लीजै सब कोय |
कहैं कबीर कछु भेंट धरूँ, जो तेरे घर होय ||

 

अर्थ : सब कोई कान लगाकर सुन लो | सन्तों लो खाली हाथ मत विदा करो | कबीर जी कहते हैं, तम्हारे घर में जो देने योग्य हो, जरूर भेट करो |

 

|| 10 ||

सुनिये पार जो पाइया, छाजिन भोजन आनि |
कहैं कबीर संतन को, देत न कीजै कानि ||

 

अर्थ : सुनिये ! यदि संसार – सागर से पार पाना चाहते हैं, भोजन – वस्त्र लाकर संतों को समर्पित करने में आगा – पीछा या अहंकार न करिये |
इस तरह से आपने संत कबीरदास जी के सर्वश्रेष्ठ दोहे | Kabir Ke Dohe Part-2 In Hindi में पढ़े है | आप इसे अपने दोस्तों को share जरुर करना |

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Srushti Tapase

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