संत कबीरदास

संत कबीरदास जी के दोहे | Kabir Ke Dohe – 3 हिंदी में अर्थसहित

Kabir Ke Dohe | संत कबीरदास जी के दोहे से आप एक अच्छी सिख ले सकते हो | इन्होंने जीवन में कैसे रहना चाहिये और संपूर्ण जीवन पर अच्छी बातें बताई है | कबीरदास एक महान कवी थे | इनके दोहे जग प्रसिद्ध है |

Kabir Ke Dohe

Kabir Ke Dohe कबीरदास के दोहे हिंदी में अर्थसहित

|| १ ||

चाल बकुल की चलत है, बहुरि कहावै हंस |

ते मुक्ता कैसे चुगे, पड़े काल के फंस ||

अर्थ : जो बगुले के आचरण में चलकर, पुनः हंस कहलाते हैं वे ज्ञान – मोती कैसे चुगेगे ? वे तो कल्पना काल में पड़े हैं |

 

|| २ ||

बाना पहिरे सिंह का, चलै भेड़ की चाल |

बोली बोले सियार की, कुत्ता खावै फाल ||

अर्थ : सिंह का वेष पहनकर, जो भेड़ की चाल चलता तथा सियार की बोली बोलता है, उसे कुत्ता जरूर फाड़ खायेगा |

|| ४ ||

जौ मानुष ग्रह धर्म युत, राखै शील विचार |

गुरुमुख बानी साधु संग, मन वच सेवा सार ||

अर्थ : जो ग्रहस्थ – मनुष्य गृहस्थी धर्म – युक्त रहता, शील विचार रखता, गुरुमुख वाणियों का विवेक करता, साधु का संग करता और मन, वचन, कर्म से सेवा करता है उसी को जीवन में लाभ मिलता है |

|| ५ ||

शब्द विचारे पथ चलै, ज्ञान गली दे पाँव |

क्या रमता क्या बैठता, क्या ग्रह कांदला छाँव ||

अर्थ : निर्णय शब्द का विचार करे, ज्ञान मार्ग में पांव रखकर सत्पथ में चले, फिर चाहे रमता रहे, चाहे बैठा रहे, चाहे आश्रम में रहे, चाहे गिरि – कन्दरा में रहे और चाहे पेड की छाया में रहे – उसका कल्याण है |

Kabir Ke Dohe 

|| ६ ||

गुरु के सनमुख जो रहै, सहै कसौटी दूख |

कहैं कबीर ता दुःख पर वारों, कोटिक सूख ||

अर्थ : विवेक – वैराग्य – सम्पन्न सतगुरु के समुख रहकर जो उनकी कसौटी और सेवा करने तथा आज्ञा – पालन करने का कष्ट सहता है, उस कष्ट पर करोडों सुख न्योछावर हैं |

|| ७ ||

कवि तो कोटि कोटि हैं, सिर के मूड़े कोट |

मन के मूड़े देखि करि, ता संग लिजै ओट ||

अर्थ : करोडों – करोडों हैं कविता करने वाले, और करोडों है सिर मुड़ाकर घूमने वाले वेषधारी, परन्तु ऐ जिज्ञासु! जिसने अपने मन को मूंड लिया हो, ऐसा विवेकी सतगुरु देखकर तू उसकी शरण ले |

|| ८ ||

बोली ठोली मस्खरी, हँसी खेल हराम |

मद माया और इस्तरी, नहि सन्त के काम ||

अर्थ : बोली – ठोली, मस्खरी, हँसी, खेल, मद, माया एवं स्त्री संगत – ये संतों को त्यागने योग्य हैं |

|| ९ ||

भेष देख मत भूलये, बुझि लीजिये ज्ञान |

बिना कसौटी होत नहिं, कंचन की पहिचान ||

अर्थ : केवल उत्तम साधु वेष देखकर मत भूल जाओ, उनसे ज्ञान की बातें पूछो! बिना कसौटी के सोने की पहचान नहीं होती |

|| १० ||

बैरागी बिरकात भला, गिरही चित्त उदार |

दोऊ चूकि खाली पड़े, ताके वार न पार ||

अर्थ : साधु में विरक्तता और ग्रस्थ में उदार्तापूर्वक सेवा उत्तम है | यदि दोनों अपने – अपने गुणों से चूक गये, तो वे छुछे रह जाते हैं, फिर दोनों का उद्धार नहीं होता |

|| ११ ||

घर में रहै तो भक्ति करू, नातरू करू बैराग |

बैरागी बन्धन करै, ताका बड़ा अभागा ||

अर्थ : साधु घर में रहे तो गुरु की भक्ति करनी चहिये, अन्येथा घर त्याग कर वेराग्ये करना चहिये | यदि विरक्त पुनः बंधनों का काम करे, तो उसका महान सुर्भाग्य है |

|| १२ ||

धारा तो दोनों भली, विरही के बैराग |

गिरही दासातन करे बैरागी अनुराग ||

अर्थ : धारा तो दोनों अच्छी हैं, क्या ग्रास्थी क्या वैराग्याश्रम! ग्रस्थ सन्त को गुरु की सेवकाई करनी चहिये और विरक्त को वैराग्यनिष्ट होना चहिये |

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Srushti Tapase

मेरा नाम सृष्टि तपासे है और मै प्यारी ख़बर की Co-Founder हूं | इस ब्लॉग पर आपको Motivational Story, Essay, Speech, अनमोल विचार , प्रेरणादायक कहानी पढ़ने के लिए मिलेगी |
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