व्रत और त्यौहार

Karwa Chauth In Hindi करवा चौथ कथा व्रत की कहानी

करवा चौथ भारत में सभी विवाहित महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक है। इस दिन, महिलाएं अपने पति के लंबे जीवन के लिए  कामना करती रहती हैं। त्यौहार विशेष रूप से उत्तरी भारत में मनाया जाता है। जल्दी सूर्योदय के साथ सुबह जल्दी शुरू होता है और देर शाम तक चंद्रमा निकलने तक चलता रहता है। हिंदुओं के चंद्रमा कैलेंडर के अनुसार, करवा चौथ उत्सव कार्तिक महीने (अक्टूबर या नवंबर में) में मनाया जाता है। भारत के कई राज्यों में, इस दिन अविवाहित महिलाओं द्वारा वांछित जीवन साथी प्राप्त करने के लिए रखा जाता है। Karwa Chauth In Hindi करवा चौथ कथा व्रत की कहानी

Karwa Chauth In Hindi

Karwa Chauth In Hindi करवा चौथ कथा व्रत की कहानी

करवा चौथ का दिन ज्यादातर उत्तरी भारतीय समुदाय के बीच मनाया जाता है जो या तो भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों में बस जाता है। इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उत्तर भारतीय महिलाओं द्वारा शाम को शुरू किया जाता है और चंद्रमा को देखकर वे अंततः उपवास तोड़ते हैं। करवा चौथ अद्वितीय है क्योंकि दुनिया में कहीं भी पत्नी अपने पति की दीर्घायु और कल्याण के लिए प्रार्थना करने के लिए भोजन या पानी के बिना रहती है।

करवा चौथ की कथा

एक समय की बात है कि एक करवा नाम की पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ नदी के किनारे के गाँव में रहती थी। एक दिन उसका पति नदी में स्नान करने गया। स्नान करते समय वहाँ एक मगर ने उसका पैर पकड़ लिया। वह मनुष्य करवा-करवा कह के अपनी पत्नी को पुकारने लगा।

उसकी आवाज सुनकर उसकी पत्नी करवा भागी चली आई और आकर मगर को कच्चे धागे से बाँध दिया। मगर को बाँधकर यमराज के यहाँ पहुँची और यमराज से कहने लगी- हे भगवान! मगर ने मेरे पति का पैर पकड़ लिया है। उस मगर को पैर पकड़ने के अपराध में आप अपने बल से नरक में ले जाओ।

यमराज बोले- अभी मगर की आयु शेष है, अतः मैं उसे नहीं मार सकता। इस पर करवा बोली, अगर आप ऐसा नहीं करोगे तो मैं आप को श्राप देकर नष्ट कर दूँगी। सुनकर यमराज डर गए और उस पतिव्रता करवा के साथ आकर मगर को यमपुरी भेज दिया और करवा के पति को दीर्घायु दी। हे करवा माता! जैसे तुमने अपने पति की रक्षा की, वैसे सबके पतियों की रक्षा करना।

करवा चौथ व्रत की विधी

सम्पूर्ण भारत में करवा चौथ के नाम से जाना जाने वाला वैवाहित श्त्रियों को यह पर्व उत्तर-पूर्वी भारत में प्रसिद्ध है | निर्जला एकादशी के सामान यह व्रत भी निर्जला ही किया जाता है| इस दिन समस्त स्त्रियाँ अपने-अपने पतियों की लम्बी उम्र के लिए भगवान शिव और गौरी की आराधना करतीं है| यह व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चौथी तिथि को मनाया जाता है|

श्री करक चतुर्थी व्रत करवा चौथ के नाम से प्रसिद्ध है| पंजाब, उतरप्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान का प्रमुख पर्व है | यह कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखा जाता है | सौभाग्यवती स्त्रियाँ अपने पति के रक्षार्थ इस व्रत को रखती है | गोधुली की वेला यानी चंद्रयोदय के एक घंटे पूर्व श्री गणपति एवं अम्बिका गोर, श्री नन्दीश्र्वर, श्री कार्तिकेयजी ,श्री शिवजी, माँ पार्वतीजी,  श्री अम्बिका पार्वतीजी और चन्द्रमा का पूजन किया जाता है | यह व्रत निर्जला किया जाना चाहिए परन्तु दूध, दही, मेवा, खोवा का सेवन करके भी यह व्रत रखा जा सकता है |  अपनी मर्यादा के अनुकूल व्रत एवं पूजन करना चाहिए | विशेष बात यही है कि अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए | महिलाओं को पूजन के समय उपयुक्त लगने वाले वस्त्रो को पहन कर नथ, करधन आदि आभूषण पहन कर पूर्ण श्रृंगार करके पूजन के लिए तयार होती है | नैवेध के लिए चावल की खीर, पोहा ,दहिवड़ा, चावल या चने की दाल का फरा, चने की दाल की पूरी या अन्य तरह की पूरी और गुड़ का हलवा बनाना चाहिए | देवताओं की प्रतिभा अथवा चित्र का मुख पश्चिम दिशा की ओर होना चाहिए | पूजन के लिए स्वयं पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए क्यूंकि ज्ञान, कर्म, तेज और शक्ति का स्वामी सूर्य पूर्व में उदित होता है |

करवा चौथ की पूजा 

1. श्री गणेश
सुपारी पर रक्षासूत्र यानि मौली गोलाकार में इस तरह लपेटें कि सुपारी पूर्णतया ढक जाये | एक कटोरी या अन्य छोटे पात्र में थोडा सा अक्षत रखें | इस अक्षत पर गणेश रूप मौली को रखें |

2. माँ अम्बिका गौरी
पीली मिट्टी की गौर बनायें | मिट्टी गोलाकार करके उपरी सतह पर मिट्टी का त्रिकोण बनायें | मिट्टी उपलब्ध न होने पर एक ताम्बे के सिक्के पर रक्षासुत्र लपेटें एवं एक छोटे से लाल कपड़े से ढक दें | एक रोली की बिंदी लगाये अथवा बनी हुई बिंदी लगाये | भाव यह रखें कि माँ गौर का मुख है | अम्बिका गौर के स्वरुप को श्रद्धा पूर्वक गणेश जी के बगल में बायीं ओर रखें |

3. श्री नन्दीश्र्वर
एक पुष्प को श्री नन्दीश्र्वर का स्वरुप मान कर स्थान दें |

4. श्री कार्तिकेय
एक पुष्प को श्री कार्तिकेय का स्वरुप मान कर स्थान दें |

श्री नन्दीश्र्वर एवं श्री कार्तिकेय हो तो उत्तम है | श्री शंकर, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय एवं श्री नन्दा का सम्मलित चित्र उपलब्ध रहता है | पुष्प स्वरुप रखना हो तो गणेश और गौरी के समीप दुसरे पात्र में अक्षत के ऊपर रखें |

5. श्री शंकर जी
प्रमुख देवता श्री शिव जी के शिवलिंग का चित्र गणेश गौर, नन्दीश्र्वर, कार्तिकेय के पीछे रखें |

6. श्री पार्वती जी
हल्दी एवं आंटे के सम्मिश्रण से पानी डाल कर घोल तैयार करें | येन एपन कहलाता है | इससे किसी गत्ते पर पार्वती जी का चित्र बनाये | चित्र में आभूषण पहनाने के लिए कील लगायें | जैसे कंठ में माला के लिए कील लगायी वैसे कंठ के दायें बायें कील लगायें | चरणों में पायल पहनाने के लिए दोनों चरणों के दोनों ओर कांटी लगाये | माँ के चरणों का भक्तिपूर्वक पूजन करें |

7. करवा
मिट्टी, तांबे, पीतल अथवा चांदी के २ करवा | करवा ना हो तो २ लोटा | करवा में रक्षा सूत्र बांधें | एपन से स्वास्तिक बनायें| दोनों करवों में कंठ तक जल भरें | या एक करवा में दुध अथवा जल भरें | एक करवा में मेवा जो सास को दिया जाता है | दुध अथवा जल में भरे करवे में ताबें या चांदी का सिक्का डालें |

8. पूजन सामग्री
धुप, दीप, कपूर, रोली, चन्दन, सिंदूर,काजल इत्यादी पूजन समग्री थाली में दाहिनी ओर रखें | दीपक में घी इतना हो कि सम्पूर्ण पूजन तक दीपक प्रज्वालित रहे |

9. नैवेध
नवैध में पूर्ण फल,सुखा मेवा अथवा मिठाई हो | प्रसाद एवं विविध व्यंजन थाली में सजा कर रखे | गणेश गौर, नन्दी एवं कार्तिकेय और श्री शिव जी के लिए नैवेध तीन जगह अलग अलग छोटे पात्र में रखें |

10. जल के लिए ३ पात्र
१ आचमन के जल के लिए छोटे पात्र में जल भर कर रखे | साथ में एक चम्मच भी रखें |
२ हाथ धोने का पानी इस रिक्त पात्र में रखें |
३ विनियोग के पानी के लिए बड़ा पात्र जल भर कर रखें |

11. पुष्प
पुष्प एवं पुष्पमाला का चित्र स्वयं के दाहिनी ओर स्थापित करें |

12. चन्द्रमा
चंद्रदेव या चन्द्रमा का चित्र स्वयं के दाहिनी ओर स्थापित करें | सब तैयारी हो जाने पर कथा सुने और फिर चन्द्रमा के निकलते ही श्री चंद्रदेव को अर्ग देकर भोजन ग्रहण करें |

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Srushti Tapase

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