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पराठा बेचनेवाला बना 18 करोड़ का मालिक | Suresh Chinnasami Success Story Hindi Me

आज हम सुरेश चिन्नासामी सफ़लता की कहानी के बारे में जानते है | कैसे उन्होंने पराठा बेचकर 18 करोड़ कमाए इसके बारे में जानते है | Suresh Chinnasami Success Story Hindi Me

अपने पिता के पराठे बेचने के ठेले पर काम करने पर एक बच्‍चे को स्‍कूल में छींटाकशी का शिकार होना पड़ता था, लेकिन उसने अपना जीवन बदलने के लिए कड़ी मेहनत की. आज वह एक restarant चेन का मालिक है, जिसका महज दो साल में सालाना टर्नओवर 18 करोड़ रुपए पहुंच गया है.

कैसे उन्होंने पराठा बेचकर 18 करोड़ कमाए इसके बारे में जानते है | Suresh Chinnasami Success Story Hindi

पराठा बेचनेवाला बना 18 करोड़ का मालिक | Suresh Chinnasami Success Story Hindi Me

सुरेश की उम्र 37 साल है और आज भी सकारात्मक ऊर्जा से लबालब हैं.

बचपन के दिनों को याद करते हुए सैमीज़ डोसाकाल के संस्‍थापक सुरेश कहते हैं, “मेरे पिता ने साल 1979 में बसंत नगर में एक ठेले से खाने की दुकान की शुरुआत की. फिर उन्होंने मरीना बीच पर ठेला लगाना शुरू किया. साल 1987 में अड्यार में एक छोटी सी जगह किराए पर ली और मटन व चिकन ग्रेवी के साथ लंच बेचना शुरू किया.”

अड्यार में उनकी दुकान पर निर्माण कार्य में ढेर सारे मज़दूर खाना खाने आते थे और इस तरह उनका काम बढ़ने लगा.

सुरेश बताते हैं, “जब मैं 12 साल का था, तभी से पिता की मदद करने लगा था. मुझसे तीन साल बड़ा मेरा भाई और मैं खाना बनाते और बर्तन धोते थे.”

उन दिनों सुरेश ऑलकॉट मेमोरियल स्कूल में पढ़ते थे, जहां उन्हें मुफ़्त शिक्षा और दोपहर का खाना मिलता था.

जब परिवार एक और दुकान खोलने के लिहाज से डिंडीगुल स्थानांतरित हुआ, तब उनकी उम्र 13 साल थी और उन्होंने स्कूल जाना बंद कर दिया था. उनके पिता गांव पेरियाकोट्टाई में खेती करने लगे, साथ ही उन्होंने नज़दीकी नगर पलानी में छोटी सी दुकान खोल ली.

सुरेश अपने पिता के साथ दुकान में काम करते, तो बड़ा भाई गांव में फ़सल की देखभाल करता और स्कूल जाता. हालांकि खेती से ख़ास आमदनी नहीं हुई, तो दो साल बाद परिवार ने चेन्‍नई लौटने का फ़ैसला किया.

चेन्नई में उन्होंने ईस्ट कोस्ट रोड के श्रीनिवासपुरम में एक जगह किराए पर ली और भोजन के बिज़नेस को आगे बढ़ाया.

जब सुरेश ने पिता की दुकान से 100 मीटर आगे इडली, डोसा और पूड़ी बेचने के लिए अलग ठेला लगाने का इरादा किया, तब उनकी उम्र मात्र 15 साल थी.

सुरेश बताते हैं, “जल्द ही मेरे ठेले की बिक्री पिताजी की दुकान की बिक्री से ज़्यादा होने लगी. वो अगर दिन के 200 रुपए कमाते तो मेरी बिक्री 250 रुपए होती. मैं लोगों को दिन का खाना भी बेचने लगा और जल्द ही हमने एक और ठेला लगाना शुरू कर दिया. मेरी मां उस ठेले का ध्यान रखतीं और हमने पहली बार लोगों को काम पर रखना शुरू किया.”

एक दिन उनकी दुकान में एक वृद्ध ग्राहक आया और उन्होंने सुरेश को कक्षा 10 की परीक्षा में प्राइवेट परीक्षार्थी के तौर पर बैठने का सुझाव दिया. इस सुझाव ने उनकी ज़िंदगी बदल दी.

काम से लौटने के बाद रात 11 से 1 बजे तक वो पढ़ाई करते. उन्होंने 37 प्रतिशत अंकों से परीक्षा पास की और बसंत नगर में अरिग्नार अन्ना गवर्नमेंट हायर सेकंडरी स्कूल में प्रवेश लिया, जहां कक्षा 12 तक पढ़ाई की.

स्कूल छूटने के बाद अपने ठेले पर काम में जुटने वाले सुरेश बताते हैं, “साथी मुझे पराठा बनाने वाला कहकर बुलाते, लेकिन मुझे कभी इस बात का न बुरा लगा, न ही अपने काम पर शर्म आई. इससे मुझे ज़्यादा मेहनत से काम करने की प्रेरणा मिलती ताकि मैं परिवार की मदद कर सकूं.”

कक्षा 12 पास करने के बाद उन्होंने साल 1997 में बीए कॉर्पोरेट सेक्रेटरीशिप इवनिंग कोर्स ज्वाइन कर लिया. अगले साल मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ़ होटल मैनेजमेंट में डिप्लोमा के लिए दाखिला लिया.

सुरेश बताते हैं, “उस वक्त तक हम बिज़नेस से ठीकठाक पैसा कमाने लगे थे. हालांकि मुझे अहसास हुआ कि अगले स्तर तक पहुंचने के लिए पढ़ाई पर ध्यान देना होगा.”

“मैं सुबह से दोपहर तीन बजे तक कैटरिंग की क्लास अटैंड करता. उसके बाद तजुर्बे के लिए होटल सवेरा के किचन में काम करता.”

साल 2001 में, सुरेश ने क्रूज़ शिप में बतौर कुक नौकरी करने का फ़ैसला किया और चेन्नई की इंडस हॉस्पिटैलिटी करियर्स ऐंड ट्रेनिंग में एक महीने का कोर्स किया.

पराठा बेचनेवाला बना 18 करोड़ का मालिक | Suresh Chinnasami Success Story Hindi Me

अगले साल उन्होंने मुंबई में इंटरव्‍यू दिया और दुनिया के सबसे बड़े क्रूज़ शिप में से एक कार्निवाल क्रूज लाइन में सपनों की नौकरी हासिल कर ली.

जब उन्‍होंने अपना हूनर दिखाने के लिए मियामी जाना पड़ा, तो परिवार ने एक लाख रुपए इकट्ठा किए. इस वक्त तक परिवार पर तीन लाख रुपए कर्ज़ चढ़ चुका था, लेकिन सुरेश ने कुछ ही समय में यह कर्ज़ चुकता कर दिया.

वो बताते हैं, “मैंने जहाज़ पर 500 अमेरिकी डॉलर की तनख्‍़वाह पर असिस्टेंट कुक के तौर पर काम किया. साथ ही हाउसकीपिंग में पार्ट टाइम नौकरी की जिसके लिए 600 डॉलर अलग से मिलते. मैं कमरे, टॉयलेट साफ़ करता और बिस्तर ठीक करता.”

हाल ही में वाडापलानी में आउटलेट शुरू करने वाले सुरेश कहते हैं, “हर साल मुझे प्रमोशन मिलता और पांचवें साल जब मैंने जहाज़ छोड़ा, तब मैं शेफ़ बन चुका था और महीने के 2,000 डॉलर कमाने लगा था, जिसमें टिप शामिल थी.”

कार्निवाल के बाद वो कैरिबियन स्थित ग्रैंड कैमन आइलैंड चले गए, वहां एक जमैकावासी को एक बार और रेस्तरां स्‍थापित करके दिया. सात महीने बाद वो आइलैंड की बड़ी होटल रिट्ज़ कार्लटन से जुड़ गए.

सुरेश बताते हैं, “मैंने साल 2013 तक कार्लटन में काम किया. इस दौरान मासिक कमाई चार से पांच लाख रुपए महीना हो गई थी. मैं अपनी पत्नी दिव्या को भी यहां ले आया, जिसने स्पा में बतौर को-ऑर्डिनेटर काम किया और तीन लाख रुपए प्रति महीना कमाने लगी.”

सुरेश ने साल 2008 में दिव्या से शादी की थी और उसी साल उन्होंने उनकी जहाज़ में नौकरी दिलवा दी.

दिव्या और सुरेश दोनों साल 2013 में चेन्नई लौट आए. तब तक उन्होंने अच्छे-ख़ासे पैसे जमा कर लिए थे. उन्होंने चेन्नई में एक रेस्तरां चेन में शेफ़ के तौर पर दो साल काम किया और फिर साल 2016 में 1.8 करोड़ रुपए के निवेश से पेरांबूर के स्पेक्ट्रम मॉल में 10,000 वर्ग फ़ीट जगह पर खुद के रेस्तरां की शुरुआत की.

इस रेस्तरां की सफ़लता के बाद उन्होंने अगले कुछ महीनों में पांच नए रेस्तरां खोले.

सुरेश कहते हैं, “मैं किसी काम में अपना पैसा निवेश करता हूं और मुनाफ़े को नए काम में लगा देता हूं. जब तंगी होती है तो निजी निवेशकों से पैसे उठाता हूं और मुनाफ़े से उसे चुका देता हूँ.”

वो कहते हैं, “साल 2017-18 में हमारा टर्नओवर 18 करोड़ रुपए रहा. मेरे होटल मुनाफ़े में चल रहे हैं. मैं हर महीने 25 प्रतिशत मुनाफ़ा कर्मचारियों के साथ बांटता हूं. इससे सब खुश हो जाते हैं और मुनाफ़ा कमाने में एक क़दम आगे बढ़ाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं.”

सुरेश ने अपनी कंपनी को रजिस्टर करवा लिया है और उनकी कंपनी में क़रीब 400 कर्मचारी काम करते हैं.
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Srushti Tapase

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